
सफेद कोट के पीछे छिपी मौत: क्या ऑपरेशन थिएटर में शराब के नशे में थे डॉक्टर?
डॉक्टर या यमराज? 'सत्यार्थ हॉस्पिटल' में गरीब की जान से खिलवाड़! हाथ का ऑपरेशन, डॉक्टर का 'नशा' और लालजी की मौत—लखनऊ के अस्पताल में बड़ा खेल! ऑपरेशन थिएटर से फरार हुए डॉक्टर, अस्पताल प्रबंधन की चुप्पी—आखिर कौन बचा रहा है मौत के सौदागरों को?
अजीत मिश्रा (खोजी)
सफेद कोट के पीछे छिपी मौत: क्या अस्पताल अब ‘इलाज का मंदिर’ नहीं, ‘मौत का सौदागर’ बन गए हैं?
“सफेद कोट के पीछे भगवान नहीं, लापरवाही का नशा है!” लखनऊ के सत्यार्थ हॉस्पिटल में एक गरीब की मौत ने अस्पताल की व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल। क्या ऑपरेशन थिएटर में शराब पीकर इलाज कर रहे थे डॉक्टर? प्रशासन की चुप्पी क्यों? राहुल सोनकर को इंसाफ कब मिलेगा?
ब्यूरो रिपोर्ट | लखनऊ/बस्ती
- ‘सत्यार्थ हॉस्पिटल’ का काला सच: फाइल पर साइन किसी और के, ऑपरेशन में कोई और!
- मेडिकल लापरवाही या हत्या? अस्पताल की बदइंतजामी की भेंट चढ़ा एक और परिवार।
- न्याय की आस में राहुल: क्या खून से सनी पर्ची दिला पाएगी भाई को इंसाफ?
- डिग्री बड़ी या जवाबदेही? लखनऊ के एक हॉस्पिटल में मरीजों की जिंदगी दांव पर।
क्या अस्पताल में भर्ती होना अब मौत को निमंत्रण देना है? राजधानी लखनऊ के कृष्णा नगर स्थित ‘सत्यार्थ हॉस्पिटल’ से एक ऐसी रूह कंपा देने वाली घटना सामने आई है, जिसने चिकित्सा व्यवस्था की नींव हिला दी है। हाथ के एक ‘सिंपल ऑपरेशन’ के लिए भर्ती कराए गए 38 वर्षीय लालजी सोनकर की मौत ने उन दावों की पोल खोल दी है, जिनमें अस्पतालों को ‘भगवान का घर’ कहा जाता है। 
इलाज के नाम पर मौत का खेल
रायबरेली के रहने वाले लालजी सोनकर के भाई राहुल सोनकर ने अपने भाई को ठीक होने की उम्मीद के साथ 14 जुलाई की सुबह 9:30 बजे अस्पताल में भर्ती कराया था। डॉक्टरों ने भरोसा दिलाया था कि छोटा सा ऑपरेशन है और दोपहर 3 बजे तक सब ठीक हो जाएगा। सारी मेडिकल रिपोर्ट ‘नॉर्मल’ थीं, सब कुछ सही चल रहा था। लेकिन नियति कुछ और ही खेल रही थी।
कांपते हाथ और नशे का साया?
परिजन का आरोप है कि रात 8:30 बजे जब वार्डबॉय ने उन्हें बुलाया, तो अंदर का मंजर भयानक था। आईसीयू की ओर ले जाए जा रहे लालजी को देखकर राहुल का कलेजा मुंह को आ गया। राहुल का दावा है कि ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर की आंखें लाल थीं, हाथ कांप रहे थे और जुबान लड़खड़ा रही थी। जब भाई की जान जा रही थी, तब वह डॉक्टर सवालों का जवाब देने के बजाय अपनी दुनिया में मस्त था। एक घंटे बाद वही ‘कोट वाला भगवान’ बाहर आता है और निर्लिप्त भाव से कहता है— “हमने बहुत कोशिश की।”
जिम्मेदार कौन? सवालों के घेरे में अस्पताल प्रशासन
लालजी की मौत के बाद अस्पताल में जो हुआ, वह किसी सोची-समझी साजिश जैसा है। अस्पताल मालिक और कुछ डॉक्टरों ने आनन-फानन में मुख्य आरोपी डॉक्टर को गाड़ी में बिठाया और फरार करा दिया। फोन बंद, अस्पताल के गेट पर ताला—आखिर यह खामोशी किस बात की गवाही दे रही है? क्या यह प्रशासनिक मिलीभगत है या अपराधियों को बचाने का एक व्यवस्थित तंत्र?
इंसाफ की जंग: दांव पर हैं ये नाम
पीड़ित राहुल सोनकर अब दर-दर भटक रहा है। खून से सनी पर्ची और आंखों में आंसू लिए उसके पास सिर्फ एक सवाल है—क्या मेरा भाई सिर्फ इसलिए मर गया क्योंकि उसे इलाज के बजाय नशे की भेंट चढ़ा दिया गया? इस मामले में निम्नलिखित डॉक्टरों की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है:
- डॉ. विनय त्रिपाठी: ऑपरेशन के मुख्य आरोपी, जिन पर नशे की हालत में इलाज करने का गंभीर आरोप है।
- डॉ. आशीष यादव व डॉ. सुमन शेखर: ऑपरेशन थिएटर में मौजूद रहकर भी क्या ये मूकदर्शक बने रहे?
- डॉ. दिलीप सिंह: एनेस्थेटिस्ट के तौर पर फाइल पर इनके हस्ताक्षर हैं, जिम्मेदारी किसकी थी?
- डॉ. विवेक मल्होत्रा व डॉ. सतेन्द्र पाण्डेय: अस्पताल प्रशासन के इन नामों पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
प्रशासन की चुप्पी कब टूटेगी?
पुलिस के सामने भी ये अस्पताल प्रबंधन सीना तानकर खड़ा है, यह कहकर कि “डॉक्टर नहीं आएंगे।” यह सिर्फ एक लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था के माथे पर लगा एक कलंक है।
क्या सत्ता और रसूख के आगे एक गरीब की जान की कोई कीमत नहीं? लालजी सोनकर की मौत का जिम्मेदार कौन है? यह जांच का विषय है, लेकिन जो हुआ है, वह हर उस व्यक्ति के लिए खतरे की घंटी है जो आज भी सफेद कोट पर आँख मूंदकर भरोसा करता है।
सवाल अब भी वही है—क्या सफेद कोट के पीछे वाकई डॉक्टर हैं, या मौत के सौदागर?




















